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रास पूर्णिमा 2025 – कब, क्यों और कैसे मनाएँ?

क्या आप जानते हैं कि रास पूर्णिमा सिर्फ होली नहीं है? यह त्यौहार कृष्ण‑कृष्णा की लीलाओं को याद करता है और भारत में कई जगहों पर धूमधाम से मनाया जाता है। 2025 में यह पवन 14 मार्च (हिंदू कैलेंडर के अनुसार) को पड़ेगा, इसलिए तैयारी शुरू करिए।

रास पूर्णिमा का इतिहास

रास पूर्णिमा की जड़ें वैष्णव साहित्य में मिलती हैं। पुराणों के मुताबिक, जब कृष्ण ने ग्वालियों के साथ रास लीला खेली, तो वह प्रेम‑भक्ति का प्रतीक बन गया। इस दिन को पावन माना जाता है क्योंकि यह आध्यात्मिक एकता और सामाजिक मेलजोल को दर्शाता है। कई प्राचीन मंदिरों में इस अवसर पर विशेष पूजा और नृत्य आयोजित होते थे।

इतिहास बताता है कि मध्यकाल में राजाओं ने इस त्यौहार को बड़े धूमधाम से मनाया, जिससे रास पौराणिक कथा का प्रसार हुआ। उत्तर भारत के ब्रज क्षेत्र में तो रास पूर्णिमा को होली की तरह ही रंग‑बिरंगे जलसेलों और फुहारे वाले माहौल में बदला गया।

आधुनिक समय में रास पौर्‍णिमा कैसे मनाएँ?

आजकल लोग इस त्यौहार को दो तरीके से देखते हैं – धार्मिक और सामाजिक दोनों. अगर आप घर पर रख‑रखाव करना चाहते हैं, तो सबसे पहले मंदिर या घर के पूजा स्थल पर कृष्ण की मूर्ति रखें। लाल-पीले रंग के फूल, पंखुड़ी और हल्दी चढ़ाएँ। फिर रास लीला का छोटा नाटक तैयार करें – बच्चों को ग्वालियों की भूमिका में डालें, संगीत और ढोलकी से माहौल बनाएं।

शहरों में बड़े इवेंट होते हैं: ब्रज‑धाम, वृंदावन, अयोध्या आदि में रंगीन परेड, फटाके और डीजे के साथ पार्टी आयोजित होती है। यदि आप बाहर जाना चाहते हैं तो स्थानीय कार्यक्रम की टाइम‑टेबल देखिए, क्योंकि कई बार इस दिन विशेष कंची‑मल्ला या झूला प्रतियोगिताएँ भी लगती हैं.

खाना‑पीना न भूलें! रास पूर्णिमा में मीठे पकवान जैसे गुजिया, फुसे और ठंडाई बहुत लोकप्रिय होते हैं। घर पर बनाते समय थोड़ा दही डालें तो ठंडाई अधिक स्वादिष्ट लगेगी. साथ ही, आप अपने मेहमानों को नारियल पानी या आम का शरबत भी पेश कर सकते हैं – यह गर्मी में ताज़गी देता है.

सोशल मीडिया पे भी इस दिन की धूम देखना मजेदार रहता है। कई युवा इंस्टाग्राम और टिकटॉक पर रासलीला के छोटे‑छोटे वीडियो बनाते हैं, जिससे त्योहार की पहचान दूर‑दूर तक फैलती है. अगर आप चाहें तो #RasaPurnima या #रासपौर्‍णिमा टैग करके अपनी झलकियाँ शेयर कर सकते हैं.

एक बात याद रखें – रास पूर्णिमा का असली मतलब एकता और प्रेम है. चाहे रंग‑बिरंगे कपड़े पहनें, गाने गाएँ या मिठाई बाँटें, यही भावना को आगे बढ़ाना चाहिए। इस साल 2025 में रास पौर्‍णिमा के साथ अपने रिश्तों को भी नया रंग दें.

तो तैयार हैं? अपनी योजना बनाइए, परिवार और दोस्तों को बुलाइए और रास पूर्णिमा की खुशियों को पूरा भारत में फैलाइए। हर साल का यह खास दिन आपको खुशी, शांति और नई ऊर्जा दे!

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